दिल्ली में हार के बाद भाजपा प.बंगाल की तैयारियों में जुटी, रणनीति को लेकर राज्य ईकाई बंटी

कोलकाता. दिल्ली विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद भाजपा 2021 में होने वाले पश्चिम बंगाल चुनाव की तैयारियों में जुट गई है। लेकिन रणनीति को लेकर पार्टी की राज्य ईकाई बंटी नजर आ रही है। पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि सीएए और एनआरसी के मुद्दे पर दिल्ली चुनाव में हुए नुकसान से सीख लेते हुए भाजपा को राज्य में केंद्र की योजनाओं के आधार पर चुनावी बिसात बिछानी चाहिए। जबकि एक धड़े का मानना है कि पार्टी को अपना आक्रामक रुख नहीं छोड़ना चाहिए और पुरानी नीतियों के आधार पर ही चुनाव में उतरना चाहिए।


बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने न्यूज एजेंसी को बताया कि दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी गुड गवर्नेंस के मुद्दे पर चुनाव में उतरी और 62 सीटें जीतकर तीसरी बार सत्ता हासिल की। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से 18 और दिल्ली की सभी 7 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इसके 9 महीने बाद दिल्ली में हुए विधानसभा चुनाव में नतीजे बिल्कुल उलट आए। इसलिए हम इसे हल्के में नहीं ले सकते कि बंगाल में हमने 18 लोकसभा सीटें जीती थीं, तो हम विधानसभा में भी उतनी ही सीटें जीतेंगे। हमें अपनी रणनीति बदलनी होगी। विधानसभा के चुनाव बिल्कुल अलग होते हैं, इसलिए हमें उसी हिसाब से रणनीति बनानी होगी। यह जरूरी नहीं है कि जिस रणनीति के सहारे लोकसभा चुनाव लड़े गए, वही विधानसभा में भी कारगर हो। 


पार्टी नेताओं का मानना हमें बंगाल में सीएए लागू करने की वजह बतानी चाहिए


इस भाजपा नेता ने आगे बताया कि पश्चिम बंगाल चुनाव में हमें सीएए लागू करने की वजह बतानी चाहिए। राज्य के लिए एनआरसी क्यों जरूरी है, इस पर भी जोर देना चाहिए। हमें यहां अगर सत्ता में आना है तो विकल्प के तौर पर दूसरे मुद्दों को भी साथ लेकर चलना होगा। खासतौर पर गुड गवर्नेंस के मॉडल को। उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल की ममता सरकार राज्य में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लागू नहीं कर रही है और न ही घुसपैठियों को बाहर कर रही है। जबकि भाजपा लगातार इसे लागू करने के लिए दबाव बना रही है। 


एक धड़ा बंगाल में आक्रामक रणनीति पर काम करने पर जोर दे रहा


वहीं, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष से जुड़े एक धड़े की इससे अलग राय है। इसके मुताबिक पश्चिम बंगाल में पार्टी की रणनीति में बदलाव की जरूरत नहीं, क्योंकि इसी आक्रामक राजनीति के दम पर ही पार्टी को सकारात्मक नतीजे मिले। इस धड़े का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियों से मुकाबला करने के लिए थोड़ी आक्रामकता जरूरी है। लोकसभा चुनाव के दौरान सीएए और एनआरसी जैसे मुद्दों पर हमने जो रुख अपनाया उसका फायदा पार्टी को मिला। अगर हम अपनी रणनीति बदलते हैं, तो जनता और पार्टी के कार्यकर्ताओं में ऐसा संदेश जाएगा कि हम पीछे हट रहे हैं।